सफला एकादशी 2019: जन्म को सफल करे सफला एकादशी, पढ़ें कथा

अनीता जैन, वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 17 Dec 2019 10:51 AM IST
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पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सफला एकादशी कहा जाता है। सफला एकादशी व्रत इस वर्ष 22 दिसंबर को है। भगवान विष्णु ने जनकल्याण के लिए अपने शरीर से पुरुषोत्तम मास की एकादशियों सहित कुल 26  एकादशियों को उत्पन्न  किया। गीता में भी परमेश्वर श्री कृष्ण ने इस तिथि को अपने ही  समान बलशाली बताया है। 
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पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी तिथि का महत्त्व समझाते हुए कहा है कि-''जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, देवताओं में श्री विष्णु तथा मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं ,उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। सभी एकादशियों में नारायण के समान ही फल देने का सामर्थ्य है। इनकी पूजा-आराधना करने वाले को किसी और पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि ये अपने भक्तों के सभी मनोरथों की पूर्ती कर उन्हें विष्णुलोक पहुंचाती हैं। 


इनमें सफला एकादशी तो अपने नाम के अनुसार ही सभी कार्यों को सफल एवं पूर्ण करने वाली है। पुराणों में इस एकादशी के सन्दर्भ में कहा गया है कि हज़ारों वर्ष तक तपस्या करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है वह पुण्य भक्तिपूर्वक रात्रि जागरण सहित सफला एकादशी का व्रत करने से मिलता है। इस दिन दीपदान करने का भी बहुत महत्त्व बताया गया है। साधक को इस दिन व्रती रहकर भगवान विष्णु की मूर्ति को 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मन्त्र का उच्चारण करते हुए स्नान आदि कराकर वस्त्र,चन्दन,जनेऊ,गंध,अक्षत,पुष्प,धूप-दीप,नैवैद्य,ऋतुफल,पान,नारियल आदि अर्पित करके कर्पूर से आरती उतारनी चाहिए ।  

कथा 
पुराणों के अनुसार राजा माहिष्मत का ज्येष्ठ पुत्र सदैव पाप कार्यों में लीन रहकर देवी-देवताओं की निंदा किया करता था। पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा ने उसका नाम 'लुम्भक' रख दिया और उसे अपने राज्य से निकाल दिया। पाप बुद्धि लुम्भक वन में प्रतिदिन मांस तथा फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। उस दुष्ट का विश्राम स्थान बहुत पुराने पीपल वृक्ष के पास था। पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह शीत के कारण निष्प्राण सा हो गया।  अगले दिन सफला एकादशी को दोपहर में सूर्य देव के ताप के प्रभाव से  उसे होश आया।  भूख से दुर्बल लुम्भक जब फल एकत्रित करके लाया तो सूर्य अस्त हो गया। तब उसने वही पीपल के वृक्ष की  जड़ में फलों को निवेदन करते हुए कहा- 'इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों'। अनायास ही लुम्भक से इस व्रत का पालन हो गया  जिसके प्रभाव से लुम्भक को दिव्य रूप,राज्य,पुत्र आदि सभी प्राप्त हुए ।

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