Pitru Paksha 2021: पितृ पक्ष पितरों के लिए पर्व का समय, जानिए सोलह श्राद्ध का महत्व

आचार्य पंडित रामचन्द्र शर्मा वैदिक, इंदौर Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 20 Sep 2021 04:03 PM IST

सार

श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है पितृऋण, वेदशास्त्र द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है श्राद्ध कर्म। श्रद्धा से किया जाए वही श्राद्ध है। 20 सितंबर को पूर्णिमा से प्रारंभ तो 6 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या। 7 सितम्बर को कोई श्राद्ध नहीं होगा।
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pitru paksha 2021: - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

17 दिनों के सोलह श्राद्ध, सर्वार्थसिद्धि योग से प्रारंभ और गजछाया योग में समापन। सौ वर्षों में बना ऐसा पितृ कृपा का संयोग। यज्ञों के समान है सोलह श्राद्ध इसमें पितरों को दिया भोजन अक्षय हो जाता है। श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है पितृऋण, वेदशास्त्र द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है श्राद्ध कर्म। श्रद्धा से किया जाए वही श्राद्ध है। 20 सितंबर को पूर्णिमा से प्रारंभ तो 6 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या। 7 सितम्बर को कोई श्राद्ध नहीं होगा।
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आश्विन कृष्ण पक्ष पितृपक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। भाद्र शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या पर्यंत सोलह दिन सोलह श्राद्ध के नाम से जाने जाते है। इस वर्ष सोलह श्राद्ध सत्रह दिनों के है। 20 सितम्बर सोमवार को पूर्णिमा तिथि से सोलह श्राद्ध प्रारम्भ हो गए हैं। अतः पूर्णिमा के श्राद्ध के साथ ही जो 6 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या तक रहेंगे। ये सोलह दिन पितरों के ऋण चुकाने के दिन है। पितृ पक्ष में परिजनों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध व तर्पण करने से उनकी तृप्ति होती है और ये वर्ष पर्यंत प्रसन्न रहते है।

       
आचार्य शर्मा वैदिक के अनुसार इस वर्ष 26 सितंबर को कोई श्राद्ध कर्म नहीं होगा। 21 सितम्बर को प्रतिपदा से श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ होंगे। 27 को षष्ठी तिथि तो शेष आगे अमावस्या तक तिथियां क्रमशः ही रहेगी। धर्मशास्त्रीय मतानुसार श्राद्ध का समय अपरान्ह काल होता है और इस समय पितृ द्वार पर आते हैं। वायु पुराण के अनुसार इन सोलह दिनों में जो भोज्य पदार्थ आदिदिया जाता है वह अमृत रूप होकर पितरों को प्राप्त होता है।

श्राद्ध में श्रद्धा, शुद्धता व पवित्रता जरूरी
पितृ पक्ष पितरों का आलय है। पितृ पक्ष में पितर पितृलोक से मनुष्य लोक में आशा लेकर आते हैं और यह देखते है कि उनके परिजन उनकी तिथि पर श्राद्ध कर्म करते हैं अथवा नहीं। ऐसा वे अमावस्या तक देखते हैं। जो पितरों की तिथि अथवा अमावस्या पर श्राद्ध कर्म करते हैं वे उन्हें आशीर्वाद प्रदान कर चले जाते हैं। यह पक्ष पितरों का आलय कहलाता है। यह समय उनका सामूहिक पर्व भी माना जाता है। मान्यता के अनुसार यह कर्म मध्यान्ह के बाद अपरान्ह काल में सम्पन्न होता है। 20 सितम्बर को पूर्णिमा अपरान्ह व्यापिनी है अतः सोमवार से पार्वण, महालय, प्रोष्ठ पदी पूर्णिमा श्राद्ध शुरू होंगे। भाद्र पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष के सभी श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं। अपरान्ह व्यापिनी तिथि ही श्राद्ध कर्म का सही समय है जो निरंतर सोलह दिनों तक चलेंगे।
 
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