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Sawan Rudrabhishek Puja 2021: श्रावण मास प्रारंभ, जानिए सावन के महीने में रुद्राभिषेक करने का महत्व

पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 21 Jul 2021 12:21 PM IST

सार

25 जुलाई से सावन का महीना प्रारंभ हो गया है। सावन का महीना भगवान शिव को बहुत ही प्रिय होता है। सावन के महीने में रुद्राभिषेक करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
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विस्तार

परब्रह्म शिव के अंतस्थल में विराजमान सभी प्राणियों के सूक्ष्मतत्व और महाप्रलय के स्वामी श्रीरूद्र को प्रसन्न करने का पुनीत और श्रेष्ठ माह श्रावण आरम्भ होने वाला है। इस माह में यदि एक भी दिन रूद्र की प्रसन्नता के लिए श्रीरुद्राभिषेक करा लिया अथवा कर लिया जाय तो उसकी सकारात्मक ऊर्जा वर्ष पर्यंत बनी रहकर घर-परिवार की हर प्रकार से रक्षा करती है। रूद्र के विषय में शास्त्र कहते हैं कि, 'रुतम्-दुःखम्, द्रावयति-नाशयतीति रुद्रः' अर्थात जो सभी प्रकार के 'रुत' दुखों को विनष्ट कर देते हैं वे ही रूद्र है। ईश्वर, शिव, रूद्र, शंकर, महादेव आदि सभी ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं, ब्रह्म का विग्रह-साकार रूप शिव है। इन शिव की शक्ति शिवा हैं इनमें सतोगुण जगतपालक विष्णु तथा रजोगुण सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। श्वास वेद हैं। सूर्य चन्द्र नेत्र हैं। वक्षस्थल तीनों लोक और चौदह भुवन हैं। विशाल जटाओं में सभी नदियों पर्वतों और तीर्थों का वास है। जहां सृष्टि के सभी ऋषि, मुनि, योगी आदि तपस्या रत रहते हैं।
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वेद ब्रह्म के विग्रह रूप अपौरुषेय, अनादि, अजन्मा ईश्वर शिव के श्वाँस से विनिर्गत हुए हैं इसीलिए वेद मन्त्रों के द्वारा ही शिव का पूजन, अभिषेक, जप, यज्ञ आदि करके प्राणी शिव की कृपा सहजता से प्राप्त कर लेता है। श्रीरुद्राभिषेक करने या वेदपाठी विद्वानों के द्वारा करवाने के बाद प्राणी को फिर किसी भी पूजा की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि ब्रह्मविष्णुमयो रुद्रः, अर्थात- ब्रह्मा और विष्णु भी रूद्रमय ही हैं। शिवपुराण के अनुसार वेदों का सारतत्व, 'रुद्राष्टाध्यायी' है जिसमें आठ अध्यायों में कुल 176 मंत्र हैं। इन्हीं मंत्रो के द्वारा 'त्रिगुण' स्वरुप रूद्र का पूजनाभिषेक किया जाता है। शास्त्रों में भी कहा गया गया है कि 'शिवः अभिषेक प्रियः' अर्थात शिव को अभिषेक अति प्रिय है।


रुद्राष्टाध्यायी का अधिक महत्व क्यों.?
रुद्राष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के 'शिवसंकल्पमस्तु' आदि मंत्रों से 'गणेश' जी का स्तवन किया गया है। द्वितीय अध्याय पुरुषसूक्त में नारायण 'श्रीविष्णु' का स्तवन है। तृतीय अध्याय के मंत्रों द्वारा देवराज 'इंद्र' तथा चतुर्थ अध्याय के मंत्रों से भगवान 'सूर्य' का स्तवन किया गया है। रुद्राष्टाध्यायी का पंचम अध्याय स्वयं रूद्र रूप है इसे शतरुद्रिय भी कहते हैं। इसके छठे अध्याय में सोम का स्तवन है। इसी प्रकार सातवें अध्याय में 'मरुत' और आठवें अध्याय में 'अग्नि' का स्तवन किया गया है। अन्य असंख्य देवी देवताओं के स्तवनभी इन्ही पाठ मंत्रों में समाहित है अतः श्रीरूद्र का अभिषेक करने से सभी देवों का भी अभिषेक करने का फल उसी क्षण मिल जाता है। रुद्राभिषेक में सृष्टि की समस्त मनोकामनायें पूर्ण करने की शक्ति है।

मनोकामनाओं के अनुसार करें अभिषेक
प्रत्येक प्राणी अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार अलग-अलग पदार्थों से श्रीरुद्राभिषेक करके इच्छित फल प्राप्त कर सकता है इनमें दूध से पुत्र प्राप्ति, मिश्री मिश्रित दूध से उत्तम विद्या, गन्ने के रस से यश, उत्तम पति/पत्नी की प्राप्ति, शहद से कर्ज मुक्ति, कुश एवं जल से रोग मुक्ति, पंचामृत से अष्टलक्ष्मी तथा तीर्थों के जल से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सभी बारह ज्योतिर्लिंगों पर अभिषेक करने पर प्राणी जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर शिव में विलीन हो जाता है। पिता दक्ष प्रजापति के घर शरीर त्यागने के पश्च्यात माता सती ने श्रावण में पुनः तपस्या करके शिव को पति रूप प्राप्त कर लिया था तभी से शिव को श्रावण माह अति प्रिय है सम्पूर्ण माह शिव पृथ्वी पर ही वास करते हैं अतः इस महीने में श्रीरुद्राभिषेक करने से ये शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।
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