Shradh 2021: श्राद्ध में कुश और तुलसी का प्रयोग क्यों है जरूरी ?

पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 20 Sep 2021 12:01 PM IST

सार

शास्त्रों के अनुसार किसी भी श्राद्ध कर्ता को तर्पण आदि करते समय कुश और तुलसी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए जिसके फलस्वरूप पितृ पूर्णरूप से तृप्त होकर अपने वंश की संतानों को आशीर्वाद देकर अपने-अपने लोक चले जाते हैं
पितृ पक्ष पर श्राद्ध करते लोग
पितृ पक्ष पर श्राद्ध करते लोग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

श्राद्ध का पक्ष पूर्णिमा श्राद्ध के साथ आरम्भ हो चुका है। शुद्ध पितृपक्ष मंगलवार, 21 सितंबर से आरम्भ हो जाएगा। सभी प्राणियों के लिए जन्मकुंडली में संतान श्राप, पितृ दोष तथा किसी भी तरह के ग्रहणदोष से मुक्ति पाने के लिए महालय यानी श्राद्धपक्ष श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार किसी भी श्राद्ध कर्ता को तर्पण आदि करते समय कुश और तुलसी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए जिसके फलस्वरूप पितृ पूर्णरूप से तृप्त होकर अपने वंश की संतानों को आशीर्वाद देकर अपने-अपने लोक चले जाते हैं इसके महत्व के विषय में शास्त्र कहते हैं कि-
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दर्भ मूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः। दर्भाग्रे शंकरं विद्यात त्रयो देवाः कुशे स्मृताः
विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर। नैते निर्माल्यताम क्रियमाणाः पुनः पुनः।।
तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकाद्शी खग। पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्ज्ताम न्रिणाम।।
विष्णु एकादशी गीता तुलसी विप्रधनेवः। आसारे दुर्ग संसारे षट्पदी मुक्तिदायनी।।


तिल मेरे पसीने से और कुश मेरे शरीर के रोम से उत्पन्न हुए हैं। कुश का मूल ब्रह्मा, मध्य विष्णु और अग्रभाग शिव का जानना चाहिए, ये देव कुश में प्रतिष्ठित माने गए हैं ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि और तुलसी ये कभी वासी नहीं होते, इनका पूजा में बार-बार प्रयोग किया जा सकता है। तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशी व्रत ये पांच डूबते लोगों के लिए नौका के सामान होते हैं। 


विष्णु, एकदशी, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ ये मुक्ति प्रदान करने के साधन हैं यही षट्पदी कहलाती है। श्राद्ध और तर्पण ये प्रधान है और पुरुषार्थ चतुष्टय को देने वाले हैं। तुलसी की गंध से पितृ गण प्रसन्न होकर अपने परिजन को आशीर्वाद देकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिण्डतर्पण करने से पितृ अनंतकाल तक तृप्त रहते हैं।

ध्यान योग्य बातें
श्राद्ध में ब्राह्मण को बैठाकर पैर धोना चाहिए, खड़े होकर पैर धोने से पितृ निराश होकर चले जाते हैं क्योंकि ब्राह्मण के शरीर में समाकर ही पितृ तर्पण और भोजन का आनंद लेते हैं। गाय, भूमि, तिल सोना, घी, वस्त्र, धान्य, गुड, चांदी, नमक इन दस वस्तुओं का दान महादान कहलाता है। जबकि तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सप्त, धान्य, भूमि और गौ ये अष्ट महादान कहे जाते हैं।

पंचबलि  विधि
श्राद्धकर्ता को पांच बलि अवश्य करनी चाहिए
गोबली- गौमाता में सभी देवी देवता पितृ विद्यमान है, अतः पहली पत्तल को भोजन 'गोभ्यो नमः' बोलते हुए गाय को खिलाना चाहिए।
श्वान बलि - पुनः पत्तल पर भोजन परोसें और श्वान यानी कुत्तों को खिलाएं।
काक बली- कौओं को तीसरी बलि, चौथी देव और पांचवी बलि चींटी को दें। ऐसा करके श्राद्ध अपने पितरों का वरदान प्राप्त करता है। 

गया, पुष्कर, प्रयाग, कुशावर्त (हरिद्वार) आदि तीर्थों में श्राद्ध की विशेष महिमा है। सामान्यतः घर में गौशाले में देवालय में गंगा यमुना, नर्वदा, आदि पवित्र नदियों के तट पर श्राद्ध करने का अधिक महत्व है। पिंड दान में अन्न,तिल, जल, दूध, घी मधु, धुप और दीप ये आठ पिंड के अंग कहे गए हैं।  

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