टोक्यो ओलंपिक: आईओसी को आखिर रूस से क्या है दिक्कत, रूसी एथलीटों के पदक जीतने पर क्यों नहीं बजता राष्ट्र गान

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 06 Aug 2021 03:18 PM IST

सार

रूस पर साल 2014 में वहां के सोची में हुए विंटर ओलंपिक के समय ही ये आरोप लगा था कि वहां पदक जीतने के लिए खिलाड़ियों को योजनाबद्ध ढंग से प्रतिबंधित दवाएं खिलाई जाती हैं। जांच के बाद आईओसी ने रूस पर 2022 तक के लिए प्रतिबंध लगा दिया...
रूसी खिलाड़ी
रूसी खिलाड़ी - फोटो : Agency
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विस्तार

रूस को औपचारिक रूप से टोक्यो ओलंपिक में शामिल नहीं होने दिया गया। डोपिंग का नियोजित सिस्टम चलाने के आरोप में रूस पर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने प्रतिबंध लगा दिए। यह रियायत जरूर दी गई कि रूसी खिलाड़ी रशियन ओलंपिक कमेटी (आरओसी) के नाम से भाग ले सकेंगे। इसीलिए टोक्यो ओलंपिक में रूस अकेला देश है, जिसके खिलाड़ियों के जीतने पर रूस की राष्ट्रीय धुन नहीं बजाई गई है। न ही यहां रूस का राष्ट्रीय झंडा फहराया गया है।
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ऐसे में रूस के जिन एथलीटों ने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया, उन्हें डोपिंग से हुई राष्ट्रीय बदनामी और कोविड-19 महामारी से बने माहौल की दोहरी मुसीबत के बीच प्रदर्शन करना पड़ा है। लेकिन उन्हें एक बात की सुविधा रही। उन्होंने अपनी ट्रेनिंग देश के पूर्वी शहर वाल्दीवोस्तोक या सखालीन द्वीप में की। उन दोनों जगहों का वातावरण जापान के मौसम से काफी मेल खाता है।


रूस पर साल 2014 में वहां के सोची में हुए विंटर ओलंपिक के समय ही ये आरोप लगा था कि वहां पदक जीतने के लिए खिलाड़ियों को योजनाबद्ध ढंग से प्रतिबंधित दवाएं खिलाई जाती हैं। जांच के बाद आईओसी ने रूस पर 2022 तक के लिए प्रतिबंध लगा दिया। इसीलिए रूस के 330 एथलीटों का दल यहां आरओसी के बैनर तले पहुंचा। उनके पदक जीतने पर यहां रूस के राष्ट्रीय धुन के बजाय खास तौर पर पियानो से तैयार की गई एक धुन यहां बजाई गई है।

रूस सोवियत संघ के जमाने से ही ओलंपिक खेलों की बड़ी ताकत रहा है। लेकिन इस बार जिस माहौल में उसके खिलाड़ी यहां आए, उसे देखते हुए आरओसी ने कहा था कि वे अगर 50 मेडल जीत लें, तो ये संतोष की बात होगी। लेकिन रूसी एथलीटों ने ओलंपिक खेलों के नौवें दिन ही अपने पदकों की संख्या 50 से ऊपर पहुंचा दी। कई ऐसे खेलों में उन्होंने कामयाबी हासिल की, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।

उनमें ही टेनिस का मिक्स्ड डबल्स भी है। इसका स्वर्ण पदक रूस के आंद्रेय रुबलेव और अनास्तेसिया पावल्युचेंकोवा की जोड़ी ने जीता। रुबलेव ने अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा- ‘ओलंपिक खेलों में रूसी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, यह बहुत खास बात है।’ इसी तरह माकसिम ख्रमोतकोव ऐसे पहले खिलाड़ी बने, जिन्होंने रूस के लिए ताएकवोंडो में स्वर्ण पदक जीता। उसके अगले ही दिन इस खेल की एक दूसरी श्रेणी का स्वर्ण पदक रूस के व्लदीस्लाव लेरिन ने जीता। 1996 के बाद पहली बार रूस की पुरुष और महिला जिमनास्टिक टीमों ने स्वर्ण पदक जीता है।

कई रूसी खिलाड़ियों ने इस पर अफसोस जताया कि उनकी कामयाबी के समय उन्हें अपने देश का झंडा लहराने या देश का राष्ट्र गान सुनने का मौका नहीं मिला। लेकिन रूसी खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन की चौतरफा तारीफ हुई है। इसका श्रेय सोवियत जमाने में बने सिस्टम और खिलाड़ियों की मेहनत और लगन को दिया गया है।

जब खेलों का आरंभ हुआ तब आरओसी ने एक बयान में कहा था- ‘कोई चाहे या न चाहे हम यहां पहुंच चुके हैं। माफ उन्हें कीजिए जो कमजोर हैं। ईश्वर न्याय करता है। हमारे लिए वह हमारा सहायक भी है।’ रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने इंस्टाग्राम पर डाले गए एक पोस्ट में कहा था- आरओसी, हम कामयाब होंगे। उसके बाद देश में सोशल मीडिया पर यही वाक्य हैशटैग के रूप में ट्रेंड करने लगा। अब जबकि ओलंपिक खेल समापन के करीब हैं, पर्यवेक्षकों का कहना है कि रूसी खिलाड़ियों ने अपने देशवासियों के भरोसे को सही साबित कर दिखाया है।
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