अपराजिता: मां की मेहनत रंग लाई, खेती और दूध बेचकर पढ़ाया, चार बेटियां बनीं सिपाही

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Mon, 25 Jan 2021 12:17 AM IST
अपराजिता: चार बेटियां बनी सिपाही
अपराजिता: चार बेटियां बनी सिपाही - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
ख़बर सुनें
यह प्रेरक कहानी एक ऐसी महिला की है जिसने संघर्ष की आग में खुद तपकर औलाद के भविष्य को कुंदन सा दमकाया है। यह अपराजिता हैं रैपुरा अहीर गांव की मछला देवी। इनका एक ही सपना था कि औलाद कामयाब बने। आज इनकी चारों बेटियां यूपी पुलिस में हैं और बेटा पीएसी में। बच्चों को इस मुकाम तक पहुंचाना तब और मुश्किल हो गया था जब किसान पति वीरेंद्र सिंह का निधन हो गया लेकिन इन्होंने हौसले के दम पर चुनौतियों का सामना किया। खुद खेत में फावड़ा चलाया, पशु पालकर दूध बेचा पर अर्जुन की तरह नजर हमेशा लक्ष्य पर रही। मां के सपने को सच करने के लिए बेटियों और बेटे ने मेहनत में कसर नहीं छोड़ी।
विज्ञापन


गहने बेच दिए पर बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी
मैं खुद पढ़ी-लिखी नहीं हूं लेकिन यह अच्छी तरह जानती हूं की पढ़ाई-लिखाई में बड़ी ताकत है। मैं यही ताकत बेटियों और बेटे को दिलाना चाहती थी ताकि वे काबिल बन सकें। वर्ष 2002 में पति के निधन के बाद मुश्किल आई। मुझे खेत संभालना था और चूल्हा-चौका भी। सुबह उठते ही मैं खेत पर जाती और बच्चों को दौड़ के लिए भेजती, मुझे ज्यादा नौकरियों का पता ही नहीं था। इतना जानती थी कि फौज और पुलिस में जाने के लिए दौड़ में पास होना जरूरी है, इसलिए बच्चों की फिटनेस पर ध्यान दिया।


दिक्कत तब आती थी जब खेती करके और पशुओं का दूध बेचकर भी इतने पैसे नहीं मिलते थे कि सभी बच्चों की फीस भर पाऊं लेकिन मैं चुनौतियों से हार मानने वाली नहीं थी, एक-एक कर गहने बेच देती और मन को समझा लेती कि ये तो फिर बन जाएंगे। खुशी इस बात की है कि औलाद ने सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। आज पूरा गांव हमारे परिवार का सम्मान करता है तो लगता है कि संघर्ष छोटा था, यह सम्मान बड़ा है।
 

मछला देवी
मछला देवी - फोटो : अमर उजाला
दोनों गुर्दों में पथरी थी, फिर भी रोज ढाई किमी. दौड़ लगाती थी: सुनीता
नियुक्ति : वर्ष 2016, वर्तमान तैनाती : किला थाना, बरेली
मां ने कहा था कि जीवन में कभी डरना नहीं, डरते वे हैं जो कमजोर होते हैं। मैंने यह बात गांठ बांध ली। रायभा के कॉलेज से बीबीए तक  पढ़ाई की। इसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गई। दौड़ के लिए तो रोज जाती ही थी। लक्ष्य सामने था लेकिन मेरे दोनों गुर्दों में पथरी हो गई। आरपीएफ में भर्ती के लिए दौड़ लगानी थी और पथरी का दर्द उठ रहा था। ऑपरेशन करा नहीं सकती थी, क्योंकि फिर दौड़ नहीं लगा पाती। इसलिए दर्द लेकर ही दौड़ी। मैंने दौड़ में टॉप किया। हालांकि  आरपीएएफ में चयन नहीं हो सका। इसके बाद पुलिस की तैयारी में जुट गई। कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे पर तैयारी तो करनी ही थी। मां की दुआएं मेरे साथ थीं, वर्ष 2016 में यूपी पुलिस में भर्ती हो गई।

सिपाही बनते ही पूरा परिवार संभाला
खाकी वर्दी मिलते ही मैंने सबसे पहले मां से कहा कि अब घर की जिम्मेदारी मैं संभालूंगी। मैंने तीनों बहनों और भाई को पुलिस भर्ती के लिए तैयार किया। वर्ष 2019 में तीनों बहनों का पुलिस में और वर्ष 2020 में भाई का पीएसी में चयन हो गया।
 

सफलता का मंत्र - कर्म से ही भाग्य बदलेगा
मां एक ही बात कहती थी, हमारे कर्म ही हमारा भाग्य बदलते हैं, हर बार और हर किसी के साथ चमत्कार नहीं होता। यह हमेशा याद रहा। एक और बात थी जिसे मैं नहीं भूली, यह आगरा में एक डॉक्टर के क्लीनिक की दीवार पर पढ़ी थी, लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुकना नहीं है। स्वामी विवेकानंद का यह मंत्र, जब तकलीफ में होती हूं तो प्रेरित करता है।

2. बहन की वर्दी देख जागा पुलिस में जाने का जज्बा: कुंती
नियुक्ति : वर्ष 2019, वर्तमान तैनाती : थाना हुसैनगंज , फतेहपुर 

सुनीता बहन जब सिपाही बन गई तो मुझे लगा कि मैं भी बन सकती हूं। बीएससी कर रही थी, तभी पुलिस भर्ती निकली। पहली ही बार में पास हो गई।

3. टीचर बनना चाहती थी, फिर पुलिस की नौकरी चुनी: रंजीता
नियुक्ति: वर्ष 2019, वर्तमान तैनाती: थाना मलवा, फतेहपुर 

मैं टीचर बनने की तैयारी कर रही थी। बीएससी के बाद बीएड किया। सुनीता को देखकर ही मुझे पुलिस में जाने का मन हुआ। उसने ही तैयारी कराई। तीनों बहनों ने एक साथ फार्म भरा था। सबका चयन हो गया।

4. दीदी के कहने पर फार्म भरा, आसानी से पास हो गई: अंजलि
नियुक्ति : वर्ष 2019, वर्तमान तैनाती : थाना हुसैनगंज, फतेहपुर 

मैं तो इंटर ही कर रही थी। सुनीता दीदी ने कहा कि तू भी फार्म भर दे, मैंने भर दिया। दौड़ और कूद में मैं सबसे आगे रहती थी, इसलिए फिजिकल आसानी से पास हो गया। लिखित की तैयारी सुनीता दीदी ने करा दी थी, यह भी क्लियर हो गया।
 

5. बहनों के सिपाही बनने से मुझमें भी जागा विश्वास: धीरज
नियुक्ति : वर्ष 2020, तैनाती - पीएसी
जब चारों बहनें पुलिस में चली गईं तो भला मैं पीछे कैसे रहता। वर्ष 2020 में पीएसी में भर्ती निकली। मैंने भी कोशिश की। पहली ही कोशिश में चयन हो गया।

6. बब्बू भइया ने सिखाया मंजिल तक पहुंचना
सुनीता ने बताया कि पास के गांव कठवारी में टीचर हैं देवेंद्र (बब्बू भइया)। मेरे सिपाही बनने में उनका अहम योगदान है। उन्होंने हर कदम पर मदद की। बाद में अन्य तीनों बहनों को पुलिस भर्ती की तैयारी कराई।
 
विज्ञापन

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00