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अहम फैसला : दुष्कर्म में सजा पाया अभियुक्त हाईकोर्ट से बरी, मेडिकल परीक्षण से नहीं हुई पुष्टि

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 29 Sep 2022 11:56 PM IST
सार

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ अदालत ने इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से विश्लेषण नहीं किया। मेडिकल रिपोर्ट से रेप की पुष्टि नहीं होती है। पीड़िता की आयु को लेकर भी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा जिले के कमासिन थानाक्षेत्र में दुराचार पॉस्को एक्ट और एससीएसटी एक्ट के तहत 15 वर्ष का कारावास और जुर्माने से दंडित अभियुक्त को बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि  सेशन कोर्ट ने साक्ष्य और तथ्यों का सही तरीके से विश्लेषण नहीं किया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति समित गोपाल ने बांदा निवासी कृष्णकांत की अपील पर दिया है। 




न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ अदालत ने इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से विश्लेषण नहीं किया। मेडिकल रिपोर्ट से रेप की पुष्टि नहीं होती है। पीड़िता की आयु को लेकर भी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार पीड़िता के अनुसूचित जाति का होने का भी कोई प्रमाण नहीं उपलब्ध कराया गया है । मामले के अनुसार अभियुक्त के खिलाफ  नौ जून 2013 को बांदा जिले के कमासिन थाने में एफआईआर दर्ज कराई।

आरोप लगाया गया कि अभियुक्त ने पीड़िता को तमंचा दिखाकर उसके साथ दुराचार किया। बताया गया कि घटना 23 मई 2013 की है। पुलिस ने पीड़िता का मेडिकल कराया, जिसमें दुराचार का कोई साक्ष्य नहीं मिला। इस पर पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी। पीड़िता की ओर से प्रोटेस्ट अर्जी दाखिल की गई जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए मामले का ट्रायल शुरू किया और कृष्णकांत को 15 वर्ष कैद की सजा सुनाई। 


अपीलार्थी की ओर से कहा गया कि पीड़िता बालिग है। मेडिकल परीक्षण में दुराचार का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। याची और पीड़िता एक ही गांव के रहने वाले हैं। दोनों परिवारों के बीच रंजिश है। इसके कारण याची को फर्जी फंसाया गया है। । न्यायालय ने सेशन न्यायालय की ओर से सुनाई गई सजा रद्द करते हुए कृष्णकांत को बरी करने का आदेश दिया।
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