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हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी : गुजारा भत्ते के लिए कोर्ट की 24 वर्षों की ढिलाई न्याय की भ्रूण हत्या

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 30 Sep 2022 01:40 AM IST
सार

कोर्ट ने परिवार अदालत झांसी की ओर से 29 सितंबर 1998 के आदेश से पत्नी को एक हजार रुपये महीने का गुजारा भत्ता देने के खिलाफ  पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है।  

Allahabad High Court
Allahabad High Court - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि गुजारा भत्ते के लिए कोर्ट की ढिलाई के 24 साल, त्वरित न्याय दे पाने की विफलता और न्याय की भ्रूण हत्या के सिवाय कुछ नहीं है। कोर्ट ने ‘न्याय किया ही न जाय, होता दिखाई भी दे’ के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए महिला को पांच हजार रुपये दिए जाने का आदेश दिया है। कहा है, यह राशि उप्र विधिक सेवा प्राधिकरण, श्रीमती रेनू दयाल को आठ हफ्ते में भुगतान करे। 




कोर्ट ने परिवार अदालत झांसी की ओर से 29 सितंबर 1998 के आदेश से पत्नी को एक हजार रुपये महीने का गुजारा भत्ता देने के खिलाफ  पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है।  यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने अनिल अल्बर्ट की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने 24 साल तक याचिका तय न कर पाने को न्याय के साथ बड़ा मजाक करार दिया। 



मामले में परिवार अदालत ने 1998 में पत्नी की धारा 125 की अर्जी पर एक हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। रेलवे में मजदूर पति ने चुनौती दी। 6अक्तूबर 1999 को हाईकोर्ट ने आदेश पर रोक लगा दी और 500 रुपये गुजारा भत्ते का भुगतान करने का निर्देश दिया। वह पांच सौ रुपये मिल रहा है या नहीं रिकॉर्ड पर नहीं है।  अधिवक्ता को भी जानकारी नहीं है। 


रिकॉर्ड से इतना पता चल रहा है कि वसूली वारंट को पति ने चुनौती दी है किन्तु अंतरिम राहत नहीं मिली है।  कोर्ट ने कहा, याची अधिवक्ता परिवार अदालत के आदेश में किसी प्रकार की अवैधानिकता नहीं दिखा सके । आज की मंहगाई को देखते हुए एक हजार रुपये  काफी कम है, और याचिका खारिज कर दी।

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