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शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है पुरा का परशुरामेश्वर महादेव मंदिर

Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 01 Aug 2021 11:34 PM IST
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- भगवान परशुराम ने शिवलिंग स्थापित कर किया था मंदिर का निर्माण
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- शिवरात्रि पर लाखों श्रद्धालुओं के जलाभिषेक करने की उम्मीद, तैयारियां शुरू
संवाद न्यूज एजेंसी
बालैनी। जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर छोटे से गांव पुरा में परशुरामेश्वर महादेव मंदिर है जो हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। परशुरामेश्वर महादेव मंदिर केवल जिले ही नहीं, बल्कि अन्य कई प्रदेशों तक इसकी मान्यता है। लाखों शिवभक्त श्रावण और फाल्गुन के माह में पैदल ही हरिद्वार से कांवड़ में पवित्र गंगाजल लाकर परशुरामेश्वर महादेव का अभिषेक करते हैं। यह मान्यता है कि भगवान शिव भी प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करतेे हैं। हालांकि इस बार कांवड़ यात्रा पर सरकार ने रोक लगाई हुई है, लेकिन उसके बाद भी आसपास के काफी श्रद्धालु यहां पहुंच रहे है। वहीं शिवरात्रि लाखों श्रद्धालु पहुंचने की उम्मीद भी जताई जा रही है, जिसको देखते हुए मंदिर समिति ने तैयारी भी शुरू कर दी है।
यह है परशुरामेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास
परशुरामेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी पंडित जयभगवान शर्मा के अनुसार यहां कजरी वन हुआ करता था और उस वन में जमदग्नि ऋषि अपनी पत्नी रेणुका के साथ आश्रम में रहते थे। रेणुका प्रतिदिन कच्चे घड़े में हिंडन नदी से जल भरकर लाती थी और वह जल शिव को अर्पण किया करती थी। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार खेलते हुए उस आश्रम में पहुंचे। ऋषि की अनुपस्थिति में रेणुका ने राजा क सत्कार किया। लेकिन राजा वहां से उनकी कामधेनु गाय कोलेकर जाना चाहता था। जिसका विरोध करने पर राजा गुस्से में रेणुका को बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर महल में ले गया। रानी ने मौका देखकर रेणुका को मुक्त्त कर दिया तो रेणुका ने वापस आकर ऋषि को सबकुछ बताया। ऋषि ने एक रात्रि अन्य पुरुष के महल में रहने के कारण रेणुका को आश्रम छोड़ने का आदेश दे दिया। रेणुका खुद को पवित्र बताते हुए वहां से नहीं जाना चाहती थी तो ऋषि ने अपने तीन पुत्रों को अपनी माता का सिर धड़ से अलग करने का आदेश दिया। लेकिन उन सभी से मना कर दिया तो उनके चौथे पुत्र परशुराम ने पितृ आज्ञा को अपना धर्म मानते हुए अपनी माता का सिर धड़ से अलग कर दिया। पंडित जयभगवान शर्मा के अनुसार उसके बाद परशुराम को इसका पश्चाताप हुआ। वह पश्चाताप करने के लिए घोर तपस्या करते हुए कुछ दूर ही शिवलिंग स्थापित कर उसकी पूजा करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए। जिनसे भगवान परशुराम ने अपनी माता को दोबारा जीवित करने की प्रार्थना की तो भगवान शिव ने उनकी माता को जीवित कर दिया और उनको एक फरसा भी दिया। उस फरसे से परशुराम ने राजा सहस्त्रबाहु व उनकी सेना को मार दिया। उसके बाद परशुराम ने शिवलिंग की स्थापना करके वहां मंदिर बनवाया था।

खुदाई कराने पर निकला था शिवलिंग
पंडित जयभगवान शर्मा ने बताया कि काफी समय बाद एक दिन लंडौरा की रानी वहां घूमने निकली तो उसका हाथी वहां आकर रुक गया। तब रानी ने सैनिकों को वह स्थान खोदने का आदेश दिया और वहां खुदाई में एक शिवलिंग निकला। माना जाता है कि जिस शिवलिंग को परशुराम ने स्थापित किया था, वह वही शिवलिंग था। जिस पर रानी ने एक मंदिर बनवा दिया। वह मंदिर आज परशुरामेश्वर मंदिर के नाम से विख्यात है। इसी पवित्र स्थल पर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी कृष्ण बोध आश्रम महाराज ने तपस्या की। अब पुरामहादेव महादेव समिति बनी है जो इस मंदिर का संचालन करती है।
शिवरात्रि की तैयारी हो गई शुरू
सरकार ने कांवड़ यात्रा पर भले ही रोक लगाई हुई है, लेकिन परशुरामेश्वर महादेव मंदिर पर शिवरात्रि की तैयारियां शुरू कर दी गई है। क्योंकि श्रावण के सभी सोमवार व शिवरात्रि पर काफी श्रद्धालु जलाभिषेक करने के लिए वहां पहुंचते है। यह माना जा रहा है कि इस बार लाखों श्रद्धालु शिवरात्रि पर भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। इसलिए ही मंदिर परिसर के आसपास टेंट लगाने का काम शुरू कर दिया गया है।
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