जाटों संग नए समीकरण साधने की कोशिश, विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी रालोद, पढ़िए खास रिपोर्ट

अनुज मित्तल, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 09 Oct 2020 10:52 AM IST

सार

  • जाट बिरादरी पर पकड़ से नए समीकरण साधने की कोशिश
  • लोकतंत्र बचाओ रैली में दिखा बुजुर्गों के साथ युवाओं का भी जोश
  • भाजपा के साथ विपक्षी दलों को भी दिया पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में दम भरने का संकेत
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jayant chaudhary rally - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मुजफ्फरनगर में लोकतंत्र बचाओ रैली के माध्यम से रालोद ने बदलते सियासी गणित की तरफ इशारा किया है। रैली में जिस तरह रालोद के समर्थन में भीड़ जुटी, उसने साफ कर दिया कि आने वाले विधानसभा चुनाव में रालोद को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। पुराना गठबंधन, बुजुर्गों के साथ नई पीढ़ी पर पकड़ होने का संदेश दिया। दो पीढ़ियों का जोश रैली में नजर आया, वह कहीं न कहीं आने वाले चुनावी समर के समीकरण की तरफ जरूर इशारा कर गया।
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हाथरस में चार अक्तूबर को जयंत चौधरी पर लाठीचार्ज हुआ। मात्र चार दिन के भीतर पश्चिमी क्षेत्र के मुजफ्फरनगर के साथ ही मेरठ, बागपत, बिजनौर, शामली, हापुड़, गाजियाबाद, सहारनपुर से भीड़ इस रैली में पहुंची। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इस भीड़ में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी मुजफ्फरनगर से रही तो दूसरे नबंर पर शामली और बागपत जनपद से रही।


लेकिन रैली में जुटी भारी भीड़ में रालोद की ही मुख्य हिस्सेदारी रही। जिसने कहीं न कहीं रालोद को संजीवनी देने का तो काम किया ही, समर्थन में साथ आए दलों सपा, कांग्रेस को भी संदेश दे दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में रालोद फिर से दम भर रही है।

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युवाओं की हिस्सेदारी ने पेश की चुनौती
लोकसभा चुनाव 2014 से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का जाट वोट बैंक बढ़ गया था। लेकिन इस जाट वोट बैंक में बुजुर्ग जहां रालोद के साथ ही नजर आये, तो युवाओं ने भाजपा का साथ दिया था। रालोद की पिछली चुनावी रैलियों में युवाओं की हिस्सेदारी कम ही नजर आई। लेकिन मुजफ्फरनगर रैली में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़चढ़ कर थी।

इसके पीछे कहीं न कहीं युवा नेता जयंत चौधरी पर हुए लाठीचार्ज से पैदा हुए आक्रोश को माना जा सकता है। लेकिन सियासी रूप में यदि इसे देखें तो रालोद के लिए यह सुखद अहसास था। तभी तो जयंत चौधरी ने भी युवाओं को फिर अपने घर लौट आने की बात मंच से कही।

फिर से गठबंधन दे सकता है चुनौती
विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी के भीतर गठबंधन ने ताल ठोकी थी। हालांकि यह गठबंधन सफल नहीं हो पाया था। जिसके पीछे एक बड़ा कारण युवा जाट वोटों का भाजपा की तरफ रुझान रहा तो अन्य बिरादरियों के वोट भी बंटे नजर आये। लेकिन इस बार सिर्फ जाट वोट ही नहीं बल्कि किसान संगठन भी एकजुट होते नजर आ रहे हैं।

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मुस्लिमों की गैरमौजूदगी से भाजपा को राहत
इस रैली में यदि सपा और कांग्रेस नेताओं के साथ आने वाले कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो पूरी तरह जाट बिरादरी की एकजुटता नजर आई। ऐसे में रालोद जिसके साथ 2014 से पहले तक मुस्लिम समाज जुड़ा नजर आता था, वह अभी भी नजर नहीं आ रहा है।

शायद मुजफ्फरनगर दंगों की टीस दोनों पक्षों में अभी भी कहीं न कहीं छिपी है। जो भाजपा के लिए राहत भरी बात हो सकती है। लेकिन सियासी गुणाभाग लगाने वालों की मानें तो इस बार विधानसभा चुनाव आने तक इसमें बदलाव होगा। ऐसे में भाजपा के खिलाफ मुस्लिम बंटा हुआ नहीं बल्कि उसके खिलाफ मजबूत प्रत्याशी के पक्ष में लामबंद नजर आने की उम्मीद जताई जा रही है।

फिर से जाट वोटों के लिए होगी खींचतान
इस रैली ने एक संदेश तो दिया है कि आने वाले दिनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में जाट वोटों को लेकर खींचतान शुरू होगी। रालोद जहां इसे स्वाभिमान के साथ जोड़कर भावनात्मक रूप से अपने खिसके वोट बैंक को बटोरने की कवायद में जुटेगा, तो भाजपा अपने इस आए हुए वोट बैंक को रोकने के लिए नये सिरे से मशक्कत जरूर करेगी।

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