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ढेका से कुटाई बंद होने से कम हुई कालानमक चावल की खुशबू

Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 31 Jul 2021 11:18 PM IST
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कभी इसी ढेका से काला नमक धान की भी कुटाई होती थी।
कभी इसी ढेका से काला नमक धान की भी कुटाई होती थी। - फोटो : SIDDHARTHNAGAR
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ढेका से कुटाई बंद होने से कम हुई कालानमक चावल की खुशबू
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सिद्धार्थनगर। ढाई दशक पहले के दौर में जब किसी घर में कालानमक चावल पकता था तो पड़ोसियों के घर तक खुशबू पहुंचती थी। बिना बताए ही लोगों को पता चल था कि उनके पड़ोसी के घर कालानमक चावल बना है, लेकिन अब इस खुशबू में कमी आ गई। इसमें सबसे बड़ा कारण है कि अब धान की कुटाई परंपरागत ढेका और ओखली में नहीं, बल्कि मशीनों से कुटाई की जा रही है।
जिले में कालानमक चावल पर आधारित गोष्ठी में आए कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरसी चौधरी ने ये बातें कहीं। कालानमक धान की नई प्रजातियों को विकसित में करने के लिए वर्षों से शोध करने वाले डॉ. आरसी चौधरी ने कहा कि इस चावल की खुशबू कम होने के कई कारण हैं।

एक कारण मशीनों से हो रही कुटाई भी है। चावल की खुशबू कायम करने के लिए धान कुटाई के मशीनों में तकनीकी बदलाव की आवश्यकता है। कुटाई के दौरान जब चावल ज्यादा गर्म हो जाता है तो उसकी खुशबू उड़ जाती है। ज्यादा खुशबू होने पर कालानमक की चावल की मांग और कीमत बढ़ जाएगी।
45 डिग्री सेंटीग्रेट तक गर्म होता है चावल
डॉ. आरसी चौधरी ने कहा कि धान की कुटाई मशीन से होती है तो चावल इतना गर्म होता है कि आप मुट्ठी में नहीं पकड़ सकते, क्योंकि उस दौरान 45 डिग्री तक चावल गर्म होता है। यह चावल जब 30 डिग्री सेंटीग्रेट से ज्यादा गर्म होता है तो उसका जैविक रसायन यानी खुशबू उड़ जाती है। सीएफसी के अंतर्गत धान और चावल को एयरकंडीशन के माध्यम से आवश्यकता तापक्रम की व्यवस्था की जाती है, लेकिन कुटाई की तकनीकी में चावल गर्म हो जाता है।
चावल में तत्वों पर हो रहा शोध
कालानमक धान की ढेका से कुुटाई और मशीनों की कुटाई पर उन्होंने शोध शुरू किया है। इसमें पता लगाया जाएगा कि मशीन से कुटाई के कारण सिर्फ कालानमक की खुशबू कम हो रही है या तत्वों में भी कम आ रही है। उन्होंने बीते दो दशक से शोध करके कालानमक की चार नई प्रजातियों को ईजाद किया है। अब लंबी डंठल के साथ मध्यम लंबाई वाली प्रजाति के माध्यम से भी कालानमक धान पैदा हो रहा है।
ऐसे होती थी ढेका से कुटाई
पुराने जमाने में लकड़ी से बना हुआ ढेका होता था। एक ओर से कोई पैर से दबाता था तो दूसरी ओर के लकड़ी के हिस्से में लगे मूसल से कुटाई होती थी। घर-घर में ढेका और ओखली हुआ करती थी। इस विधि में चावल गर्म नहीं होता था। दो-तीन बार कुटाई से चावल निकल जाता था।
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