Kargil Vijay Diwas: साथी जवानों की शहादत देख कर खौल उठता था खून 

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Sun, 26 Jul 2020 11:56 PM IST
कारगिल युद्ध जीतने के बाद भारतीय सेना
कारगिल युद्ध जीतने के बाद भारतीय सेना - फोटो : twitter
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कारगिल युद्ध के दौरान मैं 53 इंजीनियर रेजिमेंट में लांस नायक के पद पर तैनात था। तैनाती द्रास सेक्टर में थी और हम सैनिकों को तकनीकी सहायता देते थे। आज भी हमें वह मंजर याद है। दुश्मनों की गोलियों से जब अपने जवानों को शहीद होते देखते थे तो हमारा खून खौल उठता था। सेना का एक संकल्प था कि दुश्मन को उसकी औकात बता कर ही दम लेंगे। भारतीय सेना ने यह कर दिखाया। उन दिनों की यादें साझा की वाराणसी के रोहनिया क्षेत्र के बैरवन गांव निवासी रिटायर्ड फौजी लाल बिहारी पटेल ने। 
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हमारे जवानों के पराक्रम को पूरी दुनिया ने देखा और उनके युद्ध कौशल का लोहा माना। आज भी हम कारगिल युद्ध को याद करते हैं तो हमें अपने आप पर भारतीय सेना का हिस्सा होने पर गर्व महसूस होता है। हालांकि, अपने वीर साथियों को खोने का उतना ही दर्द भी है।


हमारे परम मित्र पंजाब के मनसुख और हम दोनों लोग एक साथ ही रहते थे। युद्ध के दौरान वह शहीद हो गए, लेकिन आज भी उनकी याद हमें आती है। उनके बलिदान पर हमें गर्व है। हम सैनिकों के लिए भारत मां से बढ़कर कुछ भी नहीं है। हम उनकी आन, बान और शान के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों को न्यौछावर कर सकते हैं।

कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध - फोटो : सोशल मीडिया

बेटों को भेजेंगे सेना में

सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2010 में अपने गांव का प्रधान चुना गया। घर पर पत्नी मनोरमा देवी और तीन पुत्र हैं। दूसरे और तीसरे नंबर के बेटे को सेना में भेजने के लिए तैयारी करा रहे हैं। साथ ही गांव और आसपास के बच्चों को सेना में जाने के लिए प्रेरित करते हैं। किस तरह से तैयारी की जाए, इसके बारे में भी युवाओं को बताते और समझाते हैं। सरकार और प्रशासन से कोई शिकायत नहीं है। सेना में हमने अनुशासन, ईमानदारी और मेहनत करना सीखा है। सेना से मिली सीख के सहारे आज भी जीवन जी रहे हैं।  

कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध - फोटो : अमर उजाला

संजय की शहादत पर गर्व है

गाजीपुर के मूल निवासी कुमाऊं रेजिमेंट के वीर जवान संजय यादव कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे। संजय का परिवार सारनाथ क्षेत्र की अनमोल नगर कॉलोनी में रहता है। परिजनों के अनुसार, संजय 1995 में कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती हुए थे।

कारगिल युद्ध के दौरान उनकी उम्र महज 23 वर्ष थी। एक दिन रेजिमेंट से अचानक फोन आया कि संजय शहीद हो गए हैं तो पूरे परिवार को समझ में ही नहीं आया कि यह क्या हो गया। संजय की याद तो हमेशा आती है, लेकिन उनके अदम्य साहस, वीरता और शहादत पर गर्व होता है। 

कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध - फोटो : सोशल मीडिया

अलीम ने दिखाई थी बहादुरी

कारगिल युद्ध में चौबेपुर क्षेत्र के सरसौल के मूल निवासी और पहड़िया में रहने वाले 22 ग्रेनेडियर के वीर जवान अलीम अली को आठ गोलियां लगी थी। वहीं, रोहनिया क्षेत्र के दरेखू निवासी श्रीकिशन यादव ने 22 ग्रेनेडियर के नायक के तौर पर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था।
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