Kargil Vijay Diwas: बेटे ने फर्ज निभाया, शहीद तो नेताओं के वादे हो गए

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बलिया Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Sun, 26 Jul 2020 09:40 PM IST
kargil vijay diwas
kargil vijay diwas - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
ख़बर सुनें
अवनीश यादव की कारगिल में शहादत की खबर चार सितंबर 1999 को आई तो गांव में अधिकारियों और नेताओं का रेला लग गया था। खूब वादे किए गए। समय बीता, अधिकारी बदले, नेता भी बदले और अब तो कोई भूल से भी अवनीश को याद नहीं करता। बेटे ने तो देश के प्रति फर्ज निभाया, शहीद तो नेताओं के वादे हो गए। यह कहना है शहीद अवनीश यादव के पिता शिवजी यादव का।
विज्ञापन


उनके घर के पास अमर उजाला प्रतिनिधि की बाइक रुकी तो सवाल दाग दिया कि आज कारगिल दिवस है क्या? हम उनके इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए अचकचा गए। वह फिर बोले, अरे भाई आप कौन हो, मैंने इसलिए पूछा था कि पिछले 20 साल से हमारे दरवाजे पर अनजान लोगों की गाड़ियां तभी रुकती हैं, जब उन्हें कारगिल दिवस मनाना होता है। हमारे बिना कुछ पूछे ही उनकी ये दो लाइनें यह बताने के लिए काफी थीं कि जिले के इकलौते कारगिल शहीद को जिला प्रशासन या सरकार की तरफ से कितना प्यार मिला।


जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी तय कर हम विकास खंड मुरली छपरा के ग्राम पंचायत इब्राहिमाबाद नौबरार के पुरवा दलेल टोला पहुंचे थे। यदि जिला प्रशासन और सरकार ने वादा पूरा किया होता तो हो हम लिख रहे होते अवनीशपुर गांव में पहुंचे, क्योंकि शहीद अवनीश के पिता से जो वादे किए गए थे, उनमें एक यह भी था कि गांव का नाम शहीद अवनीश के नाम पर रखा जाएगा।

बुजुर्ग दंपती शिवजी व सोमारो सामने बैठे थे। उनकी आंखें सजल हो गईं थीं। रुंधे गले से बोले, बेटा, दुनिया की इस रुसवाई में तो अब हमें भी लगता है कि उसका जन्मदिन और शहादत दिवस भूल जाएंगे और यही एक दिन बस कारगिल दिवस ही याद रह जाएगा।

20 साल बाद भी पिता को याद हैं वादे, बाकी सब भूल गए

अवनीश के पिता शिवजी यादव और मां सोमारो देवी ने बताया था कि सरकार ने गांव में अवनीश की प्रतिमा लगाने, उसके नाम पर गांव का नाम रखने, गांव में उसके नाम से विद्यालय बनवाने और गांव के मुख्य रास्ते पर गेट बनवाने का वादा किया था। लेकिन 20 साल बाद भी इनमें से एक वादा पूरा नहीं किया गया। जब ये सब नहीं करना था तो हमें आश्वासन भी नहीं देना चाहिए था।

तोप का निशाना बन टुकड़ों में बिखर गया था जिगर का टुकड़ा

शिवजी व सोमारो ने बताया कि अवनीश का जन्म 25 जनवरी 1981 को गांव में ही हुआ था। दुलारा होने के कारण वह जिद्दी हो गया था। 18 वर्ष का हुआ कि आगे पढ़ने की बात को दरकिनार कर सेना में भर्ती होने की ठान ली। उसका जुनून देखकर हमने स्वीक़ृति दे दी। वह वाराणसी में होने वाली भर्ती में पहुंचा और पहले ही प्रयास में सफल हुआ। नियुक्ति कुमायूं रेजीमेंट में हुई।

ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद पहली पोस्टिंग सियाचिन ग्लेशियर में हुई और कुछ दिनों बाद ही कारगिल युद्ध शुरू हो गया। 04 सितंबर 1999 को हनीफ सब सेक्टर के समीप अवनीश दुश्मनों की तोप का निशाना बन गया। लेकिन अब उसे न तो 25 जनवरी को याद किया जाता है और न ही चार सितंबर को। लोग आते हैं तो बस कारगिल दिवस पर। उसमें भी केवल वही लोग शामिल होते हैं, जिन्हें बेटे के बारे में कुछ लिखना होता है।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00