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अमेरिकी राष्ट्रपति का एशिया दौरा: क्या द. कोरिया और जापान को एकजुट करने में कामयाब हो पाएंगे बाइडन?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 20 May 2022 12:15 AM IST
सार

राष्ट्रपति बाइडन गुरुवार को अपनी पहली एशिया यात्रा पर रवाना हो गए हैं। अमेरिकी कूटनीति के जानकारों के मुताबिक वहां उनका ध्यान दक्षिण कोरिया और जापान के बीच एकजुटता कायम करने पर केंद्रित रहेगा। इन दोनों को अमेरिकी खेमे का देश समझा जाता है। जापान और दक्षिण कोरिया में 80 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। लेकिन इन दोनों देशों के आपसी रिश्ते तनावपूर्ण हैं...

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन। - फोटो : ANI
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विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन दक्षिण कोरिया और जापान की छह दिनों की यात्रा पर गुरुवार को रवाना हो गये हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति का पद ग्रहण करने के बाद बाइडन की यह पहली एशिया यात्रा है। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के नेताओं के साथ संबंधों को मजबूत करना है, वहीं चीन को यह संदेश देना भी है कि यूक्रेन पर रूस के हमले को देखते हुए बीजिंग को प्रशांत क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को विराम देना चाहिए।



बाइडन अपनी यात्रा के पहले दौर में दक्षिण कोरिया पहुंचेंग और फिर टोक्यो से अपनी यात्रा को समाप्त करेंगे। टोक्यो में वह ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान के अपने समकक्षों के साथ दूसरे व्यक्तिगत क्वाड शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे। ये सभी नेता आखिरी बार सितंबर में व्हाइट हाउस में मिले थे।


बाइडन इस दौरान दक्षिण कोरिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति यून सुक येओल और जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा से मुलाकात कर सकते हैं। उनकी बातचीत में व्यापार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ती मजबूती, उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के बारे में बढ़ती चिंताएं और उस देश में कोविड-19 के प्रकोप जैसे विषय आ सकते हैं। बाइडन, जापान में हिंद-प्रशांत रणनीतिक गठबंधन ‘क्वाड’ समूह के अन्य नेताओं से भी मुलाकात करेंगे, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान सदस्य हैं।


अमेरिका ने लोकतांत्रिक देशों का एक गठबंधन बनाया है ताकि रूस को यूक्रेन पर हमले की कीमत चुकाने के लिए विवश किया जा सके। इस गठबंधन में दक्षिण कोरिया और जापान भी हैं। बाइडन जानते हैं कि चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का जवाब देने के लिए उन्हें इन देशों के साथ संबंध मजबूत करने होंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की पूर्वी एशिया यात्रा के दौरान सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका के दो सहयोगी देशों के आपसी तनाव को खत्म कराना होगा। अमेरिकी टीकाकारों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका को अपने यूरोपीय सहयोगियों को एकजुट करने में सफलता मिल गई है। अब वे पूर्वी एशिया के सहयोगी देशों के बीच वैसे ही तालमेल की उम्मीद लेकर उस क्षेत्र की यात्रा पर निकले हैं।

यूक्रेन युद्ध के पहले तक यूरोपीय देशों में रूसी गैस पाइपलाइन से लेकर पश्चिम एशिया नीति और व्यापार युद्ध जैसे मसलों पर मतभेद थे। उनमें से कई देश अमेरिका के साथ अपने रिश्ते पर पुनर्विचार करने का संकेत भी दे रहे थे। लेकिन यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद ये सभी देश अमेरिका के पीछे एकजुट खड़े हो गए हैं। बल्कि अब तटस्थ रहने वाले फिनलैंड और स्वीडन जैसे देश भी नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) की सदस्यता लेने के लिए आगे आ खड़े हुए हैं।

दक्षिण कोरिया और जापान के बीच खत्म होगी कड़वाहट!

अमेरिकी कूटनीति के जानकारों के मुताबिक यात्रा के दौरान उनका ध्यान दक्षिण कोरिया और जापान के बीच एकजुटता कायम करने पर केंद्रित रहेगा। इन दोनों को अमेरिकी खेमे का देश समझा जाता है। जापान और दक्षिण कोरिया में 80 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। लेकिन इन दोनों देशों के आपसी रिश्ते तनावपूर्ण हैं। इस तनाव का संबंध 1910 से दूसरे विश्व युद्ध तक दक्षिण कोरिया में जापानी सैनिकों के कथित अत्याचार से है। दक्षिण कोरिया उस अत्याचार के बदले जापान से माफी और मुआवजे की मांग करता रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक चीन के उदय ने एशिया प्रशांत क्षेत्र को अमेरिका की प्राथमिकता बना दिया है। कुछ ही रोज पहले अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने कहा था कि चीन का उदय 21वीं सदी का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक इम्तिहान है। इस बीच उत्तर कोरिया ने भी लगातार मिसाइल परीक्षण कर इस क्षेत्र में चिंताएं बढ़ा रखी हैं। इसे देखते हुए अमेरिकी रणनीतिकारों में आम राय बनी है कि जापान और दक्षिण कोरिया की एकजुटता बेहद जरूरी है।

जापान और दक्षिण कोरिया दोनों देशों में काम करने का अनुभव रखने वाले पूर्व अमेरिकी राजनयिक इवांस रिवेरे ने कहा है- ‘अगर जापान और दक्षिण करिया आपस में लगातार बात नहीं करते हैं, अगर वे आपस में सहयोग नहीं करते हैं, तो अमेरिका के लिए चीन और उत्तर कोरिया से निपटने की रणनीति को लागू करना कठिन हो जाएगा।’

दोनों देशों में नए हाथों में नेतृत्व

बाइडन प्रशासन ने कहा है कि इन दोनों देशों में रिश्ते सुधरने की आज जितनी संभावना है, उतनी पहले कभी नहीं थी। प्रशासन के अधिकारियों ने ध्यान दिलाया है कि जापान और दक्षिण कोरिया दोनों जगह सत्ता नए नेतृत्व के हाथों में है। जापान में फुमियो किशिदा पिछले साल के आखिर में प्रधानमंत्री बने थे। दक्षिण कोरिया में यून सुक यिओल ने कुछ ही हफ्ते पहले नए राष्ट्रपति का पद संभाला है। इससे आशा है कि बाइडन को दोनों देशों को आपसी रिश्ते में एक नई शुरुआत के लिए प्रेरित करना आसान हो जाएगा।

लेकिन टोक्यो स्थित थिंक टैंक- द कैनॉन इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल स्टडीज में वरिष्ठ शोधकर्ता कोहतारो इतो ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- राष्ट्रपति यून ने नजरिया बदलने का संकेत दिया है। फिर भी बाइडन की यात्रा के दौरान कोई बड़ी सफलता मिलेगी, इसकी संभावना कम है। इसकी वजह दोनों देशों में उग्र राष्ट्रवादी मतदाताओं की बड़ी संख्या है, जिन्हें मौजूदा सरकारें नाराज नहीं करना चाहेंगी।

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