ब्रिटेन: अफगान पूर्व उपराष्ट्रपति सालेह ने कहा- पाकिस्तान की कठपुतली है तालिबान 

एजेंसी, लंदन Published by: Kuldeep Singh Updated Mon, 06 Sep 2021 08:03 AM IST

सार

  • सालेह ने डेली मेल के एक लेख में लिखते हुए कहा, तालिबान के कब्जे वाला अफगानिस्तान पाकिस्तान का बन चुका है उपनिवेश
  • सालेह ने गार्ड से कहा था अगर घायल हो जाऊं तो सिर में गोली मार देना, पर हम घुटने नहीं टेकेंगे
अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और हैबतुल्लाह अखुंदजादा
अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और हैबतुल्लाह अखुंदजादा - फोटो : Social Media
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विस्तार

पंजशीर घाटी में तालिबान से मोर्चा ले रहे धड़े का नेतृत्व कर रहे पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने ऐलान किया है कि चाहे जान देनी पड़े, लेकिन वह घुटने नहीं टेकेंगे। सालेह ने ब्रिटिश अखबार डेली मेल के लिए लिखे एक लेख में कहा, तालिबान के कब्जे वाला अफगानिस्तान अब पाकिस्तान का उपनिवेश बन चुका है।
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काबुल पर तालिबान के कब्जे के दौरान के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए सालेह ने लिखा तालिबान को पाकिस्तान नियंत्रित कर रहा है, लेकिन यह लंबा नहीं चलने वाला। वे अभी इलाके पर काबिज जरूर हैं लेकिन हमारा अतीत बताता है कि जमीन पर कब्जा कर लेने से लोगों के दिल नहीं जीते जाते, लोग नहीं जीते जाते।


तालिबान के हर कदम पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के निशान साफ दिखाई देते हैं। तालिबान के प्रवक्ताओं को हर घंटे पाकिस्तान से निर्देश मिलते हैं। सालेह ने बताया कि किस तरह देश के राजनीतिक नेतृत्व ने जरूरत के समय लोगों का साथ छोड़ दिया।

तालिबान से लड़ने की बजाय भूमिगत हो गए थे अधिकारी 
सालेह ने बताया कि कैसे अफगान अधिकारी लड़ने की बजाय भूमिगत हो गए और कुछ दिनों में ही तालिबान ने काबुल पर कब्जा जमा लिया। उन्होंने लिखा काबुल पर तालिबान के कब्जे से एक रात पहले पुलिस चीफ ने फोन पर बताया कि तालिबानी कैदी जेल से भागने के लिए उपद्रव कर रहे हैं।

मैंने पहले से ही जेल में गैर-तालिबानी कैदियों का एक गुट तैयार कर रखा था। उनके सहयोग से अफगान बलों ने जेल में हालात पर काबू पा लिया रक्षा मंत्री बिस्मिल्ला मोहम्मदी, आंतरिक सुरक्षा देखने वाले मंत्री ने तो फोन तक नहीं उठाया।
  • रिजर्व फोर्सेज, कमांडो की तैनाती के आदेश सुनने के लिए कोई था ही नहीं। फिर मैंने राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्लाह मोहिब से संपर्क किया। सब व्यर्थ रहा, कहीं से जवाब नहीं मिला।
आलीशान होटलों से विरोध की अपील
पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी और अन्य अधिकारियों पर कटाक्ष करते हुए सालेह ने कहा, वे विदेश में शाही होटल और विला से यहां के गरीब लोगों से तालिबान का मुकाबला करने की अपील करते हैं। भले ही वे कहें कि अफगानिस्तान में रुकते तो शहीद हो चुके होते। लेकिन इसमें बुराई क्या है? 
  • नेता बलिदान नहीं देंगे तो कौन देगा? वह कैद हो सकते थे और यातनाएं दी जा सकती थी लेकिन अपने लोगों की आजादी के लिए नेताओं को बंदी बनना पड़ता है।

अहमद मसूद ने दिया साथ
आखिर में सालेह ने अहमद मसूद से मदद मांगी। मसूद ने बताया वह काबुल में ही है और रणनीति पर काम कर रहे हैं।

गार्ड से कहा था- घायल हो जाऊं तो सिर में गोली मार देना, बोले- घुटने नहीं टेकेंगे
काबुल से निकलते वक्त मैंने गार्ड रहीम को कुरान की कसम दी कि अगर लड़ाई में मैं घायल हो जाऊं तो बेझिझक मेरे सिर में दो गोलियां मार देना, क्योंकि मैं तालिबान के सामने घुटने टेकने की बजाय मरना पसंद करूंगा।

हमने बड़ी मुश्किल से उत्तरी दर्रा पार किया। दो बार हमले हुए, लेकिन पंजशीर पहुंच गए। यहीं पर अहमद मसूद से मुलाकात हुई और तालिबान के विरोध की रणनीति तय की। 

पश्चिम देश अपनी इज्जत बचाएं
सालेह ने लिखा, पश्चिमी देश तालिबान के साथ समझौते की बातें कर रहे हैं। मैं पश्चिम देशों से इतना ही कहूंगा कि हमें सिर्फ नैतिक समर्थन से काम नहीं चलने वाला, प्रत्यक्ष मदद करनी होगी। तालिबान के साथ राजनीतिक समझौते के जरिए दबाव डाला जा सकता है, जिससे अफगान लोगों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन मिले।
  • यह पश्चिम का दायित्व है, साथ ही खुद उनकी प्रतिष्ठा को बचाने के बारे में है।
 

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