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चीन और यूरोपीय यूनियन के बीच निवेश को लेकर बनी सहमति, ईयू ने छोड़ीं अपनी शर्तें

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 21 Dec 2020 04:39 PM IST

सार

यूरोपीय संसद के सोशलिस्ट और डेमोक्रेट सदस्यों का कहना है कि पिछले एक साल का जो अनुभव रहा है, ये समझौता उसके बिल्कुल विपरीत होगा। उनके मुताबिक इस वक्त पूरे यूरोप में जनमत चीन पर निर्भरता के खिलाफ है...
EU China
EU China - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार

ऐसी खबर है कि तमाम आपत्तियों और हिचक को दरकिनार कर यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने चीन के साथ अपने निवेश समझौते को आखिरी रूप दे दिया है। जिन आपत्तियों को दरकिनार किया गया है, उनमें चीन में श्रम अधिकारों के पालन की शर्त भी शामिल है।

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वेबसाइट पोलिटिको.ईयू ने यूरोपियन यूनियन के राजनयिकों और अधिकारियों के हवाले से खबर दी है कि दोनों पक्षों में एक दूसरे के बाजार में पहुंच के मुद्दे पर सहमति बन गई है। ये संभावना जताई गई है कि अगले एक-दो दिन के अंदर ईयू के व्यापार प्रमुख वाल्दिस दोमब्रोवस्किस और चीन के व्यापार प्रमुख लिउ ही इस करार पर दस्तखत कर देंगे।



इस समझौते को ईयू-चीन व्यापक निवेश समझौता कहा जाएगा। इसके तहत चीन में कारखाना चला रहीं यूरोपियन कंपनियों को पूरी सुरक्षा देने का प्रावधान होगा। साथ ही ईयू के निवेशकों को चीनी कंपनियों को खरीद सकने का अधिकार मिलेगा। यही अधिकार चीनी निवेशकों को यूरोपीय कंपनियों के मामले में भी मिलेगा।

खबरों के मुताबिक ईयू के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ईयू के राजदूतों को वार्ता में हुई प्रगति के बारे में जानकारी बीते सप्ताहांत दी। उन्होंने बताया कि बातचीत में अचानक चीन ने आकर्षक ऑफर रख दिया। लेकिन उन्होंने आगाह किया कि श्रम अधिकारों के पालन के बारे में चीन ने कोई शर्त नहीं मानी है।

यूरोप के कई राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता चीन के साथ निवेश समझौता करने की ईयू की कोशिशों की आलोचना करते रहे हैं। उनका कहना है कि जिस समय चीन पर हांगकांग में लोकतंत्र का दमन करने, अपनी आबादी की निगरानी करने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने, शिनजियांग प्रांत में उइघर मुसलमानों पर ज्यादती करने, और मजदूर अधिकारों का हनन करने के आरोप लग रहे हैं, ईयू चीन के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने की दिशा में बढ़ रहा है।

लेकिन सप्ताहांत की बैठक में यूरोप के तमाम देशों के राजदूतों ने करार को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने के ईयू के प्रयासों का समर्थन किया है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि श्रम अधिकारों का पालन करने का वादा चीन से लिया जाना चाहिए।

आलोचकों ने यह भी कहा है कि इस मौके पर समझौते पर दस्तखत करने का मतलब होगा कि यूरोप अमेरिका के अगले जो बाइडन प्रशासन के साथ मिलकर चीन के खिलाफ मानव अधिकारों के मुद्दे पर सख्त कदम उठाने का मौका खो देगा। आलोचकों ने कहा है कि इस समझौते को यूरोपीय संसद से पास कराना होगा। उन्होंने संभावना जताई है कि अगर श्रम अधिकारों की शर्त समझौते में शामिल नहीं हुई, तो मुमकिन है कि यूरोपीय संसद समझौते को ठुकरा दे। संसद के सोशलिस्ट, डेमोक्रेट और ग्रीन सदस्यों ने कहा है कि श्रम अधिकारों के बिना हुए किसी समझौते के पक्ष में वे वोट नहीं डालेंगे।

कुछ जानकारों ने राय जताई है कि अभी इस समझौते पर दस्तखत करने का मतलब होगा कि ईयू चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता घटाने के लक्ष्य से दूर हो जाएगा। यूरोपीय कंपनियां चीन में बनने वाले उत्पादों पर निर्भर हैं। हाल में ये चर्चा चली कि अब सप्लाई चेन के मामले में एक देश पर निर्भर रहने के बजाय इसे अलग-अलग देशों तक फैलाने की कोशिश वे करेंगी।

यूरोपीय संसद के सोशलिस्ट और डेमोक्रेट सदस्यों का कहना है कि पिछले एक साल का जो अनुभव रहा है, ये समझौता उसके बिल्कुल विपरीत होगा। उनके मुताबिक इस वक्त पूरे यूरोप में जनमत चीन पर निर्भरता के खिलाफ है। निर्भरता इस हद तक है कि कोरोना महामारी आने पर यूरोपीय देश मास्क बना सकने की स्थिति में भी नहीं थे। उनके मुताबिक इस दिशा में सुधार के कदम उठाने के बजाय अब नया समझौता यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता के लक्ष्य से और दूर कर देगा।

लेकिन व्यापार विशषज्ञों का कहना है कि कोरोना महामारी से चोट खाया यूरोप अपने निर्यातों के लिए चीन के बाजार पर बुरी तरह निर्भर है। इसके बिना यहां आर्थिक विकास की संभावना नहीं है। 2020 की पहली तीन तिमाहियों में ईयू-चीन का व्यापार 420 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसके साथ ही चीन अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए यूरोप का सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर बन गया। इन विशेषज्ञों के मुताबिक अब ईयू इस हाल में नहीं है कि वह चीन पर ज्यादा शर्तें थोप सके।

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