चिंता: पड़ोसी देशों को आर्थिक मदद देकर भारत को घेर रहा चीन, जानिए कैसे फंसाया है कर्ज के जाल में

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Thu, 09 Sep 2021 03:02 PM IST

सार

जिस बात की आशंका थी, वही हुआ। तालिबान सरकार के बनने के 24 घंटे के अंदर अफगानिस्तान की आर्थिक संकट को दूर करने के लिए चीन आगे आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान को आर्थिक मदद देने की चीन की यह महज शुरूआत है। आगे चीन हर तरह से तालिबान के साथ खड़ा दिखेगा। 
 
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो)
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter
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विस्तार

अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने के बाद जब बाकी दुनिया इंतजार करने की नीति अपना रही है, चीन ने सबसे पहले तालिबान की तरफ मदद का हाथ बढ़ा दिया है। चीन ने अफगानिस्तान का आर्थिक संकट दूर करने के लिए बुधवार को तालिबान को 310 लाख (31 मिलियन) अमेरिकी डॉलर की मदद का एलान कर दिया। चीन ने कहा कि यह अराजकता खत्म करने और व्यवस्था बहाल करने के लिए जरूरी है।
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अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों को चीन का यह कदम सोची-समझी रणनीति लग रही है। वे मानते हैं कि चीन इस तरह से भारत के पड़ोसी देशों की मदद करके भारत को हर तरह से घेरने की कोशिश करता है, जिससे भारत कूटनीतिक तौर पर दबाव में रहे। चीन व्यापार, रक्षा सौदे, बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर इन देशों के लिए भारत से बेहतर विकल्प बनने की कोशिश में है। पाकिस्तान, श्रीलंका से लेकर बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल में विकास के नाम पर चीन इन देशों में अपना आधिपत्य स्थापित करना चाह रहा है और इस कड़ी में अब नया नाम अफगानिस्तान का जुड़ गया है। 


अफगानिस्तान पर पर्याप्त प्रभाव होना चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पूर्व और दक्षिण में पाकिस्तान, पश्चिम में ईरान, उत्तर में तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान और उत्तर पूर्व में ताजिकिस्तान और चीन से जुड़ता है। यह एशिया के एक विशाल क्षेत्र में संपर्क करने की चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का हिस्सा है।

‘डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी’ पर काम करता है चीन 
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि चीन भारत के पड़ोसी देशों के साथ डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी पर काम करता है। यानी विकास के नाम पर इन देशों को कर्ज दो और वहां अपना आधिपत्य जमाओ। दरअसल इसके पीछ चीन की दो रणनीति है। पहले तो  चीन खुद को विश्वशक्ति मानता है। विज्ञान, सैन्य ताकत में सशक्त बनना चाहता है। 1949 तक उसका लक्ष्य अमेरिका तक पीछे छोड़ने का है। इसलिए वह दुनिया के कई देशों में अपनी दखल चाहता है। अब उसकी नजर अफगानिस्तान पर है। उस देश की आर्थिक दशा बिल्कुल छिन्न-भिन्न है, ऐसे में चीन मददगार बन करआएगा और तालिाबन से अपनी मर्जी मुताबिक काम करवाना उसके लिए आसान होगा। 

भारत का विकल्प बनना चाहता है
शशांक बताते हैं चीन दूसरी रणनीति भारत के पड़ोसी देशों की आर्थिक मदद करके उन पर डोरे डालने की कोशिश करता है, जिससे इन देशों की भारत से निर्भरता कम करके अपने ऊपर निर्भरता बढ़ाई जा सके। वहीं जिससे भारत को आर्थिक और कूटनीतिक तौर पर घेरा जा सके। 

चीन ने विकास और व्यापार के नाम पर पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल की आर्थिक मदद की। वहां अपना व्यापार बढ़ाया है और अपनी कंपनियों को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी खुद ले ली है। चीन ने पाकिस्तान को सबसे ज्यादा भरोसे में लिया क्योंकि भारत को लेकर पाकिस्तान और चीन के हित एक हो जाते हैं इसलिए वह पाकिस्तान की आर्थिक मदद करके वहां अपना दबदबा बनाए रखता है जिससे भारत सुरक्षात्मक दबाव में रहे।

चीन-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती भारत के लिए खतरा पैदा कर रही है। उनके सामरिक और क्षेत्रीय हित चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से मजबूत हो रहे हैं। पाकिस्तान में चीनी सैन्य शक्ति बढ़ेगी और चीन भारत को उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर सशस्त्र बलों के साथ घेरे रहेगा। इससे चीन कश्मीर में भी दखल देने के लिए प्रेरित हो सकता है। इसलिए दोनों देशों को संभावित खतरों के रूप में देखा जाना चाहिए। आशंका है कि जैसे-जैसे इसकी ताकत बढ़ेगी यह सीमा पर और आक्रमक हो सकता है।
 
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