अफगानिस्तान: मजार-ए-शरीफ पर कब्जे से ही तय हो गई थी तालिबानी हुकूमत, जानें इस शहर की रणनीतिक अहमियत

वर्ल्ड डेक्स, अमर उजाला, काबुल Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Fri, 13 Aug 2021 10:32 AM IST

सार

  • हिंदू कुश पर्वत और अमु दरिया नदी के बीच स्थित मजार-ए-शरीफ को पुराने समय में बैक्टीरिया नाम से जाना जाता था
  • यह पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण मार्गों के बीच एक महत्वपूर्ण जंक्शन के रूप में कार्य करता है
अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा
अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

अफगानिस्तान ने एक बार फिर तालिबान का कब्जा कर लिया है और मजार-ए-शरीफ एक बार फिर सुर्खियों में है। लगभग 40 वर्षों में यह तीसरी बार है, जब इस उत्तरी अफगान शहर से देश की सत्ता का फैसला हुआ। इसके कई रणनीतिक कारण हैं। इसके लिए हमें समझना होगा कि मजार-ए-शरीफ पर काबू अफगानिस्तान पर शासन करने के लिए महत्वपूर्ण क्यों है? सोवियत, तालिबान और नाटो ने अतीत में ऐसा ही किया और 2021 में तालिबान इस बात को अच्छी तरह से समझता है।
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हिंदू कुश पर्वत और अमु दरिया नदी के बीच के मैदान पर स्थित मजार-ए-शरीफ को पुराने समय में बैक्टीरिया के रूप में जाना जाता था। यह पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण मार्गों में एक महत्वपूर्ण जंक्शन के रूप में कार्य करता है। सिकंदर महान से लेकर मंगोलों और अन्य लोगों तक की शक्तिशाली सेनाएं इन रास्तों से होकर गुजरी थीं।


अरब विद्वानों ने भी बताया है कि शहरों की जननी बैक्टीरिया में उम्म-अल-बेलाद उर्फ बल्ख जिसने चंगेज खान की रुचि को आकर्षित किया। 1220 में उसने शहर में हर एक जीवित प्राणी का नरसंहार करने के लिए अपनी मंगोल सेना भेजी। बल्ख कभी ठीक नहीं हुआ और सरकार और वाणिज्य का केंद्र 20 किमी दक्षिण में मजार-ए-शरीफ में स्थानांतरित हो गया।

शरीफ अली की दरगाह के आसपास विकसित हुआ
मजार-ए-शरीफ शरीफ अली की दरगाह के आसपास विकसित हुआ था, जो पैगंबर मुहम्मद के चचेरे भाई और दामाद थे। यही चौथे खलीफा बने थे। 658 ई. में उनकी हत्या कर दी गई। अफगानों का मानना है कि मारे गए खलीफा के शरीर को एक गुप्त स्थान पर दफनाया गया था, जिसे पांच सदियों बाद खोजा गया और इसके ऊपर एक दरगाह बनाई गई। बाद में, चंगेज खान ने इसे नष्ट कर दिया। लेकिन, मकबरे को एक बार फिर करीब 250 साल बाद खोजा गया। 1481 ईसा पूर्व में यहां एक एक भव्य मकबरा बनाया गया था। इसी 15वीं शताब्दी में बने मकबरे की वजह से शहर का नाम मजार-ए-शरीफ पड़ा। 19वीं शताब्दी के मध्य तक शहर जारिस्ट रूस और बाद में सोवियत संघ के साथ अपने व्यापार के लिए अहम हो गया।
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