दोनों देशों के बीच बढ़ रहा टकराव: अमेरिका और चीन के झगड़े में उलझ गई है जलवायु परिवर्तन वार्ता

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, शंघाई Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 03 Sep 2021 06:54 PM IST

सार

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हर गुजरते दिन के साथ ज्यादा गंभीर होते जा रहे हैं। हाल में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि दुनिया के चाल-ढाल में अगर तुरंत गुणात्मक बदलाव नहीं लाया गया, तो ग्लोबल वॉर्मिंग को खतरनाक स्तर तक बढ़ने से रोकना असंभव हो जाएगा...
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क्लाइमेट चेंज - फोटो : FILE PHOTO
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विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के जलवायु दूत जॉन केरी से बातचीत में चीन के अधिकारियों ने उनसे दो टूक कहा कि जलवायु परिवर्तन रोकने पर दोनों देशों में सहयोग बाकी मसलों पर चल रहे उनके तनाव से अप्रभावित नहीं रह सकता। जॉन केरी ने विश्व नेताओं से बातचीत के अपने सिलसिले के तहत चीन के विदेश मंत्री वांग यी से भी बातचीत की। इसी दौरान वांग ने कहा- ‘चीन और अमेरिका के बीच संबंधों का जो कुल माहौल है, उससे जलवायु परिवर्तन संबंधी सहयोग को अलग करके नहीं देखा जा सकता।’
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पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि केरी ने वांग और दूसरे चीनी अधिकारियों के साथ बातचीत दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के माहौल में की है। व्यापार, मानव अधिकारों के कथित दमन, बौद्धिक संपदा संरक्षण, और सुरक्षा कुछ ऐसे मसले हैं, जिनको लेकर हाल के महीनों में अमेरिका और चीन के बीच टकराव बढ़ता गया है।


पर्यवेक्षकों का कहना है कि ताजा वार्ता के साथ अमेरिका की इस उम्मीद को तगड़ा झटका लगा है कि चीन जलवायु परिवर्तन के सवाल को बाकी मुद्दों से अलग करके देखेगा। जॉन केरी बीते जनवरी में भी चीन की यात्रा पर गए थे। तब उन्होंने कहा था कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए सहयोग करना एक अति महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो बाकी मसलों से बिल्कुल अलग है।   

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हर गुजरते दिन के साथ ज्यादा गंभीर होते जा रहे हैं। हाल में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि दुनिया के चाल-ढाल में अगर तुरंत गुणात्मक बदलाव नहीं लाया गया, तो ग्लोबल वॉर्मिंग को खतरनाक स्तर तक बढ़ने से रोकना असंभव हो जाएगा। लेकिन पर्यवेक्षकों के मुताबिक चीन के ताजा रुख से यह साफ हो गया है कि इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना अभी भी कितना मुश्किल है।

अमेरिका और चीन दोनों ग्रीन हाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक हैं। विशेषज्ञों की राय है कि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला दुनिया कैसे करती है, इसे तय करने में अमेरिका और चीन के रुख की सबसे बड़ी भूमिका होगी। केरी अमेरिका का जलवायु दूत बनने के बाद दूसरी बार चीन आए हैं। इसी साल स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पहले आपसी सहमति बनाना उनकी यात्रा का मकसद है।

चीन ने एलान किया है कि उसके यहां ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 2030 तक अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगा। उसके बाद उसमें कमी लाई जाएगी। 2060 तक चीन कार्बन न्यूट्रल देश बन जाएगा। यानी तब चीन में कार्बन का उत्सर्जन शून्य हो जाएगा। लेकिन अमेरिका चाहता है कि चीन इस दिशा में और तेजी से कदम उठाए। केरी ने गुरुवार को यहां स्वीकार किया था कि अमेरिका और चीन के संबंध तनावपूर्ण हैं। लेकिन उन्होंने चीनी अधिकारियों से रचनात्मक रुख अपनाने की अपील की।

उधर चीन का कहना है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से अमेरिका अभी भी सबसे बड़ा उत्सर्जक है। साथ ही अतीत में जलवायु को नुकसान पहुंचाने में धनी देशों की भूमिका ज्यादा रही है। इसलिए इन देशों को जलवायु बचाने के क्रम में भी ज्यादा जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन अमेरिका और दूसरे धनी देश इस सिद्धांत को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस कारण जलवायु वार्ता जहां की तहां ठहरी हुई है।
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