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Haqqani Network: जवाहिरी का सच छिपाने की कोशिश में था हक्कानी नेटवर्क, जानें इस आतंकी संगठन के बारे में सबकुछ

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Tue, 02 Aug 2022 03:53 PM IST
सार

अल-जवाहिरी के मारे जाने के बाद हक्कानी नेटवर्क ने यह बात छिपाने की कोशिश की कि मारा गया शख्स जवाहिरी ही था। तालिबान सरकार में शामिल हक्कानी नेटवर्क एक खूंखार आतंकी सगंठन रहा है। इस आतंकी संगठन का नाम कई आतंकी हमलों में शामिल रहा है।

अलकायदा प्रमुख अल-जवाहिरी
अलकायदा प्रमुख अल-जवाहिरी - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

आतंकी संगठन अल-कायदा के सरगना अयमान अल-जवाहिरी को अमेरिका ने मार गिराया है। हमले के वक्त जवाहिरी अफगानिस्तान की राजधानी काबुल स्थित अपने घर में छिपा हुआ था। जिस घर में जवाहिरी रह रहा था वह हक्कानी नेटवर्क के सरगना और तालिबान सरकार में गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के करीबी का था। 


अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अल-जवाहिरी के मारे जाने के बाद हक्कानी नेटवर्क ने यह बात छिपाने की कोशिश की कि मारा गया शख्स जवाहिरी ही था। रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि जिस घर में जवाहिरी को मारा गया, वो सिराजुद्दीन हक्कानी के एक शीर्ष सहयोगी का था।  

तालिबान सरकार में शामिल हक्कानी नेटवर्क एक खूंखार आतंकी सगंठन रहा है। इस आतंकी संगठन का नाम कई आतंकी हमलों में शामिल रहा है। जिन तीन बड़ी घटनाओं की वजह से ये सबसे ज्यादा सुर्खियों में आया, उनमें से दो घटनाएं भारतीय दूतावास पर बड़े आत्मघाती हमले से जुड़ी हैं।  

 

सिराजुद्दीन हक्कानी
सिराजुद्दीन हक्कानी - फोटो : Agency (File Photo)
क्या है हक्कानी नेटवर्क?
हक्कानी नेटवर्क की शुरुआत अफगानिस्तान के जादरान पश्तून समुदाय से आने वाले जलालुद्दीन हक्कानी ने की थी। हक्कानी की पहचान पहली बार 1980 के दशक में मुजाहिद्दीनों द्वारा सोवियत सेना के खिलाफ लड़े जा रहे युद्ध के दौरान हुई थी। जलालुद्दीन तब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के संपर्क में आया था। यहीं से हक्कानी नेटवर्क की शुरुआत हुई। बताया जाता है कि 1979 में सोवियत सेना के जाने के बाद इस संगठन ने अफगानिस्तान में गृहयुद्ध भी लड़ा।
 
हक्कानी नेटवर्क हमेशा से तालिबान के संपर्क में नहीं रहा, लेकिन कहा जाता है कि 1995 वह दौर था, जब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पहली बार अफगानिस्तान में दो आतंकी संगठनों को साथ लाने में भूमिका निभाई। इसी के बाद से हक्कानी नेटवर्क और तालिबान साथ बने हुए हैं।
 
 

अनस हक्कानी
अनस हक्कानी - फोटो : @AnasHaqqani313
अभी कौन है हक्कानी नेटवर्क का सरगना?
हक्कानी नेटवर्क के सरगना जलालुद्दीन हक्कानी के खराब स्वास्थ्य के बाद उसके बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी ने इस संगठन की कमान संभाली। बताया जाता है कि जलालुद्दीन हक्कानी की 2015 में मौत हो गई थी, लेकिन इसका खंडन करती कई रिपोर्ट्स भी सामने आईं। आखिरकार 2018 में तालिबान ने ट्विटर पर एलान किया था कि जलालुद्दीन की मौत हो गई। हालांकि, उसकी मौत की वजह कभी सामने नहीं आ पाई।
 
मौजूदा समय में हक्कानी नेटवर्क को सिराजुद्दीन संभाल रहा है। पिछले साल अगस्त में जब तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में वापस लौटा, तब सिराजुद्दीन को इस सरकार का गृह मंत्री बनाया गया। 
सिराज का छोटा भाई अनस हक्कानी 2014 में एक बार पकड़ा जा चुका था। इसके बाद 2016 में उसे कई हत्याओं, अपहरण और अन्य अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में विदेशियों की रिहाई के बदले अनस कैद से बाहर आ गया था।  
 
 

हक्कानी और इमरान खान
हक्कानी और इमरान खान - फोटो : Amar Ujala
पाकिस्तान से है हक्कानी नेटवर्क का सीधा संबंध
हक्कानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुद्दीन ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालीम ली। हक्कानी शब्द भी पाकिस्तान की दारुल-उलूम हक्कानिया मदरसा से आया, जहां उसने पढ़ाई की। अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ जंग हो या गृहयुद्ध, हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान से लगातार मदद मिलती रही। कुछ खाड़ी देश भी इस क्रूर संगठन की फंडिंग में शामिल रहे। इसका बेस पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान स्थित मिरानशाह शहर में है। बताया जाता है कि सोवियत सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध के दौरान ही हक्कानी ने अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन के साथ करीबी रिश्ते बनाने में कामयाबी हासिल की।
 
अमेरिकी हमले के बाद पाकिस्तान ने दी मदद
अफगानिस्तान में 1995 से लेकर 2001 तक तालिबान की सत्ता में शामिल रहे हक्कानी नेटवर्क को अमेरिकी सेना के आने के बाद भागना पड़ा। उस दौरान इस संगठन के आतंकियों को पाकिस्तान में शरण मिली। ज्यादातर आतंकी पाकिस्तान के कबाइली इलाकों में छिप गए। हालांकि, बाद में पाकिस्तान की मदद से ये आतंकी दोबारा अफगानिस्तान में दाखिल हुए और अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना पर हमले करने लगे। हक्कानी नेटवर्क पर इस दौरान कई बार अल-कायदा की मदद करने और पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान स्थित अपने बेस को सौंपने के आरोप लगे।
 
 

सिराजुद्दीन हक्कानी
सिराजुद्दीन हक्कानी - फोटो : social media
अफगान सरकार पर हमलों का मास्टरमाइंड रहा हक्कानी नेटवर्क
अफगानिस्तान में सरकार के खिलाफ हमलों में एक समय तालिबान से ज्यादा हक्कानी नेटवर्क का नाम सामने आने लगा। ये वो समय था, जब भारत ने भी अफगानिस्तान की हामिद करजई सरकार से नजदीकी बढ़ाना शुरू किया। सरकार के खिलाफ हक्कानी नेटवर्क के ऑपरेशन की कमान जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे सिराजुद्दीन ने संभाली, जो कि अपने पिता से भी खतरनाक माना जाता था। इसके बाद 2008 से लेकर 2020 तक अफगानिस्तान में कई बड़े हमलों में हक्कानी नेटवर्क का नाम सामने आया। मौजूदा समय में इस संगठन में 10 हजार से लेकर 15 हजार आतंकी होने का अनुमान है।
  
भारत इसके हमले का शिकार बना
अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के निशाने पर भारत भी रहा। 7 जुलाई 2008 को हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास को निशाना बनाया। इस हमले में छह भारतीयों समेत 58 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 100 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे।  
 
2009 में  इस आतंकी संगठन ने फिर काबुल स्थित भारतीय दूतावास को निशाना बनाया। आत्मघाती हमले में 17 लोगों की मौत हुई थी। बताया जाता है कि भारत ने तब अफगानिस्तान में 5280 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स शुरू करने का वादा किया था। इसी के चलते पाकिस्तान की आईएसआई ने इन दो हमलों में हक्कानी नेटवर्क की पूरी मदद की थी। 2011 में हक्कानी नेटवर्क के आत्मघाती हमलावरों और बंदूकधारियों ने काबुल के इंटर-कॉन्टिनेंटल होटल पर हमला कर दिया। इस पूरी घटना में 21 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें नौ हमलावर शामिल थे।
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