अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट खोरासान का डर: रूस क्यों दे रहा है तालिबान को ‘बहुत अच्छे लोग’ होने का सर्टिफिकेट?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 17 Aug 2021 07:44 PM IST

सार

विश्लेषकों के मुताबिक अगर तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने की कोशिश में उदार रुख अपनाया, तो आईएस-के को अपने पांव फैलाने का मौका मिल सकता है। ये भी संभव है कि आईएस-के सीधे तालिबान से टकराव मोल ना ले और रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों में उग्रवादी गतिविधियों में शामिल होने पर ज्यादा ध्यान दे...
तालिबान
तालिबान - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार

तालिबान ने सोमवार को काबुल में उन सैनिकों को रूसी दूतावास की सुरक्षा से हटा दिया, जो वहां काफी समय से तैनात थे। उसके बाद तालिबान के प्रतिनिधियों ने रूसी राजनयिकों को आश्वासन दिया कि वे अब वे उनकी रक्षा करेंगे। मास्को में रूस सरकार के प्रवक्ता ने बताया- ‘हमारे दूतावास पर अब तालिबान के गार्ड मौजूद हैं। उसके पहले अफगान नेशनल सिक्योरिटी फोर्स ने समर्पण कर दिया। तालिबान ने कहा है कि वह किसी रूसी राजनयिक का बाल भी बांका नहीं होने देगा।’
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विश्लेषकों ने यहां ध्यान दिलाया है कि रूस में अब तक तालिबान का नाम आतंकवादी संगठन की सूची में मौजूद है। लेकिन रूसी प्रतिनिधि ने कहा- ‘हमारी तालिबान से मुलाकात हुई। वे बहुत अच्छे लोग हैं। उन्होंने बहुत संगठित ढंग से सुरक्षा गार्डों की अदला-बदली की।’ इसके पहले भी रूस ने तालिबान को ‘जिम्मेदार लोग’ बताया था। लेकिन यहां पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसी बातों के बावजूद रूस कोई असावधानी नहीं बरत रहा है। वह इस संभावना को लेकर सचेत है कि उसे एक बार फिर से इस्लामी आतंकवाद का सामना करना पड़ सकता है।


रूस की सबसे बड़ी चिंता इस्लामिक स्टेट खोरासान (आईएस-के) नाम का संगठन है। इस गुट का मुख्य अड्डा अफगानिस्तान में है। यह आतंकवादी गुट इस्लामिक स्टेट (आईएस) की ही एक शाखा है। इस गुट का मुख्य निशाना रूस और मध्य एशियाई देश रहे हैं, जहां रूस के बड़े हित हैं। लेकिन रूस के लिए राहत की बात यही है कि आईएस-के का तालिबान के साथ भी दुश्मनी का रिश्ता है। तालिबान से लड़ाई में हाल में उसे बहुत नुकसान भी उठाना पड़ा। मगर अब कुछ विश्लेषकों का कहना है कि काबुल की सत्ता पर काबिज होने के बाद तालिबान का ध्यान अब इस संगठन से हट सकता है। इससे उसका फिर से उभार हो सकता है।

विश्लेषकों की राय पर आधारित वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने की कोशिश में उदार रुख अपनाया, तो आईएस-के को अपने पांव फैलाने का मौका मिल सकता है। तब वह ये दावा कर सकता है कि अब वही देश में अमेरिका विरोधी एकमात्र संगठन है। विश्लेषकों के मुताबिक ये भी संभव है कि आईएस-के सीधे तालिबान से टकराव मोल ना ले और रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों में उग्रवादी गतिविधियों में शामिल होने पर ज्यादा ध्यान दे।

कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान का आकलन इसी आधार पर करेगा कि वह अल-कायदा से कैसे निपटता है और आईएस-के से पैदा होने वाले खतरों का मुकाबला करने में कितना सफल रहता है।

खबरों के मुताबिक आईएस-के ने हाल में आतंकवादियों के हक्कानी नेटवर्क के साथ एक समझौता किया। हक्कानी नेटवर्क बहुत पुराना आतंकवादी गुट है। बताया जाता है कि फिदायीन हमलों की शुरुआत इसी गुट ने की थी। हक्कानी गुट पिछले 20 साल के दौरान अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) सेना के साथ-साथ तालिबान से भी लड़ता रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक आईएस-खोरासान के प्रति देश के उत्तरी इलाकों के नौजवानों में काफी आकर्षण है। खासकर ताजिक और उज्बेक समुदायों में इस गुट का प्रभाव है। इसीलिए आशंका यह है कि अगर ये गुट सक्रिय हुआ, तो ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि आईएस-के का ‘वैश्विक एजेंडा’ रूस सहित अफगानिस्तान से जुड़े सभी पक्षों के लिए गहरी चिंता का विषय है। आईएस-के सीरिया में उसके खिलाफ लड़ाई में रूस की भूमिका से खफा है। इसलिए अब वह रूस को निशाना बना सकता है।

पर्यवेक्षकों के मुताबिक यही वजह है कि अफगानिस्तान के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के विशेष प्रतिनिधि जमीर काबुलोव ने तालिबान की सफलता को अच्छी खबर बताया है। रूस को अब उम्मीद है कि तालिबान की सरकार बनने से आईएस-के सहित कई दूसरे चरमपंथी गुटों के लिए मुश्किल होगी, जिनका एजेंडा मध्य एशिया या ईरान या रूस में आतंक फैलाना है।
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